हम नाभि के दम पे दाँत निपोरते हैं

तुम न जाने कितने जतन करते हो
अपनी चमड़ी को
दमड़ी खरच के सुंदर करते हो
हम माटी, कीचड़ में लोटते हैं
फिर भी खरा हैं हम
तुम्हरे तरह नही खोटे हैं
‘चीज’ कहने पे नही हंसते हैं
हम नाभि के दम पे दाँत निपोरते हैं
फिर भी सुंदर हमी दीखते हैं…
तुम भी करो ये उपाय
देखो देशीपने को एक बार अजमाय
लेटो कीचड़, माटी में
बदन में लगने दो
…सिद्धार्थ

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