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***हम तो कबूतर शांति पथ के***

Sureshpal Jasala

Sureshpal Jasala

कविता

July 1, 2016

***हम तो कबूतर शांति पथ के***

[मुहावरों का प्रयोग]

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हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे।

मानवता है धर्म हमारा , वो मानवता से दूर रहे।।

हर बार दिया मौका हमने ,बस उसकी टेढ़ी पूंछ रही !

बातों से दुष्ट नहीं माना ,तो रण में लातें खूब दई !!

गिड़गिड़ाया पड़ा कदमों में ,सारे ही नखरे चूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !! [१]

हमदर्दी की गोली से वो ,अक्सर बदहज़मी पाता है !

अस्त्र-शस्त्र की होड़ करे तो , बस मुँह की ही वो खाता है !!

पिट-पिट कर भी फुंकार भरे ,वह लज्जित भी भरपूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !![२]

दुर्गन्ध विकारों की मन में , नीयत खोटी, चोटी पर है !

मक्कारी का कुनबा जोड़ा ,धरी नींव गद्दारी पर है !!

आतंकी रक्त शिराओं में , विश्व-जन के लिये क्रूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !! [३]

हर-बार उमड़ कर आता वो,पर तड़फ-तड़फ मर जाता ! है

भारत के शेरों का गर्जन, बस नानी याद दिलाता है !!

खण्ड-खण्ड कर दो तन उनका ,जो मद में अक्सर चूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !![४]

नापाक इरादे हैं उसके ,वो प्राणी हित में है खतरा !

मिट्टी में उसको दफना दो ,कर दो निष्क्रिय कतरा-कतरा !!

कुचल धरो फन उसका ऐसा ,फिर न वो कभी मगरूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !![५]

हम तो पुजारी शांति के हैं , मत समझो तुम कमजोर हमें !

जब भी सिर आ पडे मुसीबत, तो आता पाना छोर हमें !!

नौ दो ग्यारह हो जा दुश्मन , बस ऐसा सबक जरूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !![६]

खून पसीना एक करें हम ,तब ये खुशहाली आती है !

वो आतंकी के साथ खड़ा ,करतूतें नरक डुबाती हैं !!

मर्यादायें जो भूल चुका , वो सदा-सदा मजबूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !![७]

चरित, धर्म औ शर्म सभी को,वो सच्च तिलांजलि दे बैठा !

मानवता के आभूषण ये ,कभी भाव हमारा न ऐंठा !!

तूती बोल रही भारत की ,ये देश सदा मशहूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !![८]

फलदार सदा झुककर रहते ,निकृष्ट ही सदा अकड़ते हैं !

गुणवान सदा झंडा गाड़ें ,गुणहीन तो बस गरजते हैं !!

छोड़ चलो अरिताई सारी ,बस प्रेम भरा दस्तूर रहे !

हम तो कबूतर शांति पथ के ,क्यूँ उल्लू हमको घूर रहे !![९]

*******सुरेशपाल वर्मा जसाला (दिल्ली) ,

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Author
Sureshpal Jasala
I am a teacher, poet n writer, published 8 books , started a new Hindi poem method called " Varn piramid or jasala piramid." I have membership n hold posts in many societies. Also Awarded by many societies.

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