हम गुजरते हैं कितनी राहों से

हम गुजरते हैं कितनी राहों से
पग मिलाकर समय की धारों से

देते मन को उड़ान भी ऊँची
खोल कर बेड़ियां भी पाँवों से

आये पतझड़ चले भी जाएंगे
हमको मतलब है बस बहारों से

की अभी ही शुरू उड़ाने हैं
है तआल्लुक नहीं दिशाओं से

बन न तूफान ये कहीं जाएं
लगने अब डर लगा हवाओं से

रिश्ते मजबूत सबसे होते हैं
जो बँधे होते कच्चे धागों से

‘अर्चना’ आस रोशनी की नहीं
धुयें उठते हुये चरागों से

23-02-2021
डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद

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डॉ अर्चना गुप्ता (Founder,Sahityapedia) "मेरी प्यारी लेखनी, मेरे दिल का साज इसकी मेरे बाद भी,...
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