गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

हम गुजरते हैं कितनी राहों से

हम गुजरते हैं कितनी राहों से
पग मिलाकर समय की धारों से

देते मन को उड़ान भी ऊँची
खोल कर बेड़ियां भी पाँवों से

आये पतझड़ चले भी जाएंगे
हमको मतलब है बस बहारों से

की अभी ही शुरू उड़ाने हैं
है तआल्लुक नहीं दिशाओं से

बन न तूफान ये कहीं जाएं
लगने अब डर लगा हवाओं से

रिश्ते मजबूत सबसे होते हैं
जो बँधे होते कच्चे धागों से

‘अर्चना’ आस रोशनी की नहीं
धुयें उठते हुये चरागों से

23-02-2021
डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद

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