Oct 6, 2017 · कविता
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*हम खुद ही अपने दुश्मन क्यों है*

?ये तो शायद ठीक से मालूम नहीं,
कि हम खाना ….क्यों खाते है ?
पर ये जरूर मालूम है कि
हम *खार* क्यों खाते है ?

*खार* का अर्थ = चिढना, बुरा मानना,

बनना बिगड़ना तो दस्तूर है जमाने का,
लाख कोशिश करें चाहे दुश्मन भरपूर,
अपना कुछ नहीं बिगड़ना,
जबतक खुद न चाहे,बाल हो सके न बांका,

डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
जब तक हमारी चेतना बाह्य गमन करती रहेगी
तब तक हम विकसित नहीं हो सकते,
विकासशील ही रहेंगे,
दूसरों को दुख तो दे सकते है,सुख नहीं,

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Mahender Singh Hans
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