हम कहां मूर्ख है?

आज मूर्ख दिवस है
मैंने सोचा क्यों न मूर्खता पर लिखा जाए
फिर मुझे याद आया कि इस पर लिखने की क्या आवश्यकता है?
क्योंकि वैसे भी हम तो मूर्ख है हीं
इस पर लिखना क्या?
पर हमारी मूर्खता का वर्णन भी जरूरी नहीं बहुत जरूरी है
मैं तो निश्चित तौर पर हूं और आपका मैं नहीं जानता
मैं तो इतना मूर्ख हूं कि मुझे कोई भी भारत में मूर्ख नहीं दिखता
बात ही बात में आपको मूर्खता दिवस की शुभकामनाएं भी नहीं दे पाया
क्षमा चाहता हूं
भगवान आपको वो दे जो आपके पास सबसे ज्यादा कमी हो
पर सबसे पहले बुद्धि दे दे
अब आप ही देख लीजिए मैं घर पर रहकर लिख रहा हूं और सड़कों पर लोग हैं
क्या वे मूर्ख है? नहीं,बिल्कुल नहीं,जरा सा भी नहीं बुद्धिमान है वे सब और हमें गर्व है इन पर
मूर्ख तो वो है जो घर पर है
मूर्ख तो वो है जो कर्फ्यू में घर पर रह रहे हैं
मूर्ख तो वो है जो मुंह पर मास्क बांध है
मूर्ख तो वो है जो सैनिटाइजर से हाथ साफ कर रहे हैं मूर्ख तो वो है जो 1 मीटर दूर से हाथ जोड़ ले रहे हैं
मूर्ख तो वो है जो हाथ नहीं मिला रहे हैं
मूर्ख तो वो है जो भीड़ का हिस्सा नहीं है
मूर्ख तो वो है जो सरकार के दिशा निर्देशों का पालन कर रहे हैं
इनके लिए
मैंने नोबेल पुरस्कार वालों को सुझाया है कि
इन्हें मूर्खता के क्षेत्र में 2020 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाना चाहिए
उन्होंने मुझे आश्वस्त किया है कि हम मूर्खों की सही-सही पहचान करेंगे
जो सबसे बड़ा मूर्ख होगा उसका सम्मान करेंगे
आपके विचार और सुझाव अत्यंत गंभीर हैं हम इस विषय पर विचार कर रहे हैं
आप तनिक भी चिंता मत करें
ऐसा सुनने के बाद तो मेरी और अधिक बड़ा मूर्ख बनने की प्रबल इच्छा जागृत हो गई है
नया उत्साह है,नया जोश है,मत पूछिए
मैं बनूंगा सबसे बड़ा मूर्ख, एकदम बड़ा वाला
इसी ख्याल में मैं दिन-रात डूबा रहता हूं
और अपने घर के कमरे में जी रहा हूं
आप भी जी रहे होंगे पर आपको पता नहीं होगा
चलिए खुश हो जाइए
मैंने आपको बता दिया और क्या लेंगे बच्चे की जान
करोना तो मत बनिए कम से कम
मूर्खता से मुझे याद आया कि
एक वायरस ने भी लोगों को मूर्ख बनाया है
इतना ज्यादा की लोगों का लोक ही बदल दिया है
इस वायरस के सामने आदमी मूर्ख बना खड़ा है
इस वायरस का सर्व व्यापी कार्यक्रम
“मुझे अपना बनाओ,तुम भाड़ में जाओ”लगातार जारी है बिना थके,बिना रुके
मुझे रिवाइटल का वो विज्ञापन याद आया उसमें स्लोगन है
“लिजिए रिवाइटल क्योंकि थकना मना है”
शायद करोना रिवाइटल लेता हो
मुझे बताया तो नहीं है
पर हो सकता है
और आपने अपना नाम भी कैसा रखा है “करो ना”
सब कुछ कर दो और नाम”करो ना”
करोना आदमी से बोल रहा है “आओ ना” “सुनो ना” “देखो ना” “चुनो ना” “छुओ ना” “सटो ना” “डरो ना” “मरो ना”
करोना से हम नहीं डरते
ये बात मैंने करोना को बताई है
करोना बोला मुझे बुद्धिमानों से नहीं मूर्खों से खतरा है
लेकिन जहां तक मैं जानता हूं भारत बुद्धिमानों का देश है
अच्छा अब समझ में आया की इसलिए आप यहां खूब फल-फूल रहे हैं
आप की संख्या लगातार बढ़ते ही जा रही है
आपको बुद्धिमान लोग बहुत पसंद है ना
इसी कारण आप भारत से नहीं जाना चाहते हैं
इतने अनगिनत मूर्खों के कारण हम कुछ बुद्धिमानों की जान का खतरा मोल नहीं ले सकते हैं
करोना से हुई बात में मैंने करोना से यह स्पष्ट रूप में पूछा है कि
कहीं आप हमें मूर्ख तो नहीं बना रहे हैं
आप लोगों को मूर्ख बनाने की क्या जरूरत है?
आप लोग तो पहले से ही…………….
और इस बार का नोबेल पुरस्कार भी आप लोगों को ही मिलने वाला है
मैं भी कितना मूर्खतापूर्ण सवाल करता हूं
पागल हूं,एकदम पागल,वह भी बड़ा वाला
मैं किसी को मूर्ख नहीं बना सकता
और बनाना भी नहीं चाहता
सोचिएगा आप किस को मूर्ख बना रहे हैं?
करोना को
स्वयं को
या सारी मानव जाति को
मेरा सवाल यहां से शुरु होता है-अप
सोचिएगा जरूर
कि अंत कहां होगा और कैसे होगा?
मेरी कलम कह रही है
बस कर,खामोश हो जा भगवान के लिए
रुलाएगा क्या पगले
फिर मिलेंगे एक नई सोच के साथ
क्योंकि मैं मूर्ख हूं
अपने पाठकों के साथ मैं राइटमैन (लिखने वाला)आदित्य
मेरे लिखने तक

पूर्णतः मौलिक स्वरचित सृजन की अलख करोना को मूर्ख बनाने के लिए
आदित्य कुमार भारती
टेंगनमाड़ा, बिलासपुर,छ.ग.

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