हम अपने आपकी किस्मत ख़राब लिखते हैं

कहीं अज़ाब कहीं पर सवाब लिखते हैं
फरिशते रोज़ हमारा हिसाब लिखते हैं

बहुत से लोग तो ऐसे भी हैं इसी युग में
किताब पढ़ते नहीं हैं किताब लिखते हैं

वों अपने जिस्म के ख़ानों मे आग रखते हैं
गुलाब होते नहीं हैं गुलाब लिखते हैं

यहाँ के लोग तो ताबीर जानते ही नहीं
ये अपने नींद मे रहने को ख्वाब लिखते हैं

तुम्हारे ज़ुल्म तुम्हारे सितम नहीं लिखते
हम अपने आपकी किस्मत ख़राब लिखते हैं

– नासिर राव

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