कविता · Reading time: 1 minute

हमें कौनसी चीज़ पीछे धकेल रही है,

जिस देश मे खेल पुराना कबड्डी हो,
पदक हॉकी में आये हो,
बजट क्रिकेट को मिलता हो,
दारासिंह फ्री स्टाइल विभूति हो,

राजीव दीक्षित जैसों को संदिग्ध
मृत्यु का खुलासा न होता हो,
जो बिन औषधि स्वदेशी का प्रचार था,
बात-बात पर सरकारी संपत्ति फूँकी जाती हो,

हर वर्ग की हर मजहब बात-बात पर संविधान में नहीं लिखा,
कहने वालों की इज्जत होती हो,

मेरा देश गुलामी से सीख नहीं पाया,
अंधेरे से है प्यार हमें,
नींद हमें प्यारी है,
कर रहे बहाना सोने का,
हम कुंभकरण है हमें निद्रा प्यारी है,
वरन् इस देश जितने बुद्ध आये कहीं ओर नहीं मिलती कथा कहानी सुनने को,

फिर भी हो भला इस देश कि संविधा
का एकसूत्र में पिरोए रखती है,
सबको फूल कंटक जहर सुधा नदी नारों सबको एक सूत्र में पिरोए रखते है,
जिसका हर सूत्र हो पितामह भीष्म जैसा,
पाखंडी सिखंडी बन आगे आते हो,
कौन बचाऐ भारत माता लाज तेरी
दुस्ससान दुर्योधन घर-घर पाए जाते हो,

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