हमारे गांव की पनिहारन

हमारे गांव की पनिहारन ,
नित गगरी में भरती सावन।
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देश की संस्कृति झलकती ,
जब पनघट पर पानी खींचती।
पेड़-पौधों को वो रोज सींचती,
राही-बटोही की प्यास बुझती।
बूँद-बूँद देती है जीवन,
हमारे गांव की पनिहारन…….
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चमके बिंदिया ,लचके कमरिया,
छलकत जाये माथे की गगरिया।
भींगत जाये तन की चुनरिया ,
छम-छम बाजे पाँव पायलिया।
खन-खन खनके हाथ में कंगन ,
हमारे गांव की पनिहारन…….
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बालो में सोहे फूल का गजरा।
चित चंचल,नैनो में कजरा।
एक माथे,एक कमर पे मटका।
नया रूप है निखरा-निखरा ,
भर लायी मीठा अमृत पावन,
हमारे गांव की पनिहारन…….
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नार नवेली,है एक पहेली
घूमे अकेली,संग न सहली।
काले-घने बाल सर्पीली ,
गांव की गोरी कुछ शर्मीली।
रसीली रूप बड़ा मनभावन ,
हमारे गांव की पनिहारन…….
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घर-घर गगरी भर पहुँचती ,
पनघट पर गीत रूहानी गाती।
साँस-ननद की हंसी ठिठोली ,
कुछ शिकवे शिकायते भी होती।
कहीं दूर से आती हमरे आँगन ,
हमारे गांव की पनिहारन…….
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हमारे गांव की पनिहारन ,
नित गगरी में भरती सावन।
– लक्ष्मी सिंह

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MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is...
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