कविता · Reading time: 1 minute

हमसफ़र

चाँद फिसल रहा बादल में
पत्तों की सरसराहट ने
राग नया छेड़ दिया
धाराओं की बलखाती चाल पर
हवाओं ने है डेरा डाल लिया

तुम आईना
परछाई भी
सुबह के सूरज
रात के चाँद भी
बारिश की छींक
सर्दी की धूप भी
नींद में
एक ख़्वाब
पलकों पर सजे
श्रृंगार भी
आँचल के कोर
रेशम की डोर भी…….

हर रंग के
एक चित्र
हर मौसम में
एक मित्र तुम
एहसास में
एक बोल
बहुत शोर में
एक आवाज़ तुम
सपनों के शुरूआत
ख़्वाहिशों की बुनियाद तुम
दिल की गहराई से
आकाश तक
एक ऊँचाई तुम………

लिखती हूँ
तुम्हारी कलम से
कुछ किस्से
कभी नगमे
तुम खुशी की
फसल काटो
मैं गम़ के
बीज रख लूँगी……..

तुम्हारी आँखों की
बहुत रौशनी को
सजाती…..सवाँरती…..मैं..

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