गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

हमने ही अब गम गिनाना कम किया है

हमने ही अब गम गिनाना कम किया है
ज़िन्दगी ने कब सताना कम किया है

रोज सपने टूटते रहते हमारे
पर नहीं उनको सजाना कम किया है

अब नहीं हैं वो बसंती सी बयारें
कोकिला ने गीत गाना कम किया है

कैद में तकनीकि के जो आज बचपन
बचपना उसने दिखाना कम किया है

शान के ही दायरे में बँध गया यूँ
आदमी ने मुस्कुराना कम किया है

आ गया है ‘अर्चना’ जो जख्म सीना
आंसुओं को भी बहाना कम किया है

07-02-2018
डॉ अर्चना गुप्ता

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