कविता · Reading time: 1 minute

हद

कुछ लोग मेरी आँखो में नमी देखना चाहते हैं,
वो हर हाल मे मुझ में कुछ कमी देखना चाहते है ।।
मैं भी जिद्दी हूँ सब्र का समंदर है मुझमे।
उड़ना मैं भी चाहता हु,लेकिन पाँव मेरे जमीं देखना चाहते है ।।
हमेशा उठती हैं उंगलियाँ,मेरी और ही क्यूँ,
बहुत कुछ बाकी है मुझमे,कोई उनसे पुछे वो क्या देखना चाहते है ।।
अब कुछ तल्खी तो है,की उनको रास नही आता,
भले मिट जाऊ लेकिन वो नही देख पाओगे जो देखना चाहते है ।।
बेशक कमियाँ बहुत मुझमे,लेकिन क्या बेदाग हो तुम,
अच्छा मैं गलत वो सही ,शायद वो यही देखना चाहते है ।।
अदब से पेश आता हूँ,ये कमतरी नही है,
नाहक क्यूँ किसी का जुनूँ देखना चाहते हो।।
रहे सब अपनी हद में तो अच्छा है,
आखिर क्यूँ तुम किसी की जद देखना चाहते है ।।

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