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हंसी

हंसी मानों होठों पर तैरती थी जैसे ही होठ हंसी से फैलते उसके कंधे उचकते और आंखे खिल जाती थी।कुछ साल पहले वो हर पल मुझे ढूंढतें थे स्वप्न में या यथार्थ में।व़क्त बदल गया है अब हर बात बेतरतीब-सी दिखती है पहले वो इंतज़ार करते थे अब ना मैं साथ हूं ना मेरा इंतज़ार।कभी आते हैं तो जनाब दो पल के लिए और मात्र औपचारिकता भर के लिए।

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मनोज शर्मा
मनोज शर्मा
दिल्ली
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हिन्दी लेखक एवम् कवि असिस्टैंट प्रोफेसर गैस्ट अदिति महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय एम ए हिन्दी उर्दू...
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