स्वयं शक्ति रूप

स्वयं शक्ति रूप
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शक्ति स्वयं पहचान के,त्याग हीनता भाव।
नाच मोर का वाह है,अश्रु आह लख पाँव।।
अश्रु आह लख पाँव,सकारात्मक हैं जीते।
बाकी खुद को कोस,ग़म का ज़हर हैं पीते।
जानो क्षमता आज,यही होती अमर भक्ति।
मन जीता जगजीत,इससे बड़ी है न शक्ति।

मन का हारा भाग्य है,जीत मेहनत ताज़।
स्वयं मुताबिक देखना,है मानव अंदाज़।।
है मानव अंदाज़,समझिए न बात झूठी।
तुम रूठे हो यार,जीत न ही हार रूठी।
सुन प्रीतम की बात,आश्चर्य होता फ़न का।
भ्रम चलते सब मान,पर ये खेल सब मन का।

रोगी हो मन हार के,जीता वही निरोग।
अमन दवा है रोग की,समझें भटके लोग।।
समझें भटके लोग,घर में प्रेम की गंगा।
नहा खुशी में डूब,हरिद्वार का न पंगा।
सुन प्रीतम की बात,गति मन से यहाँ होगी।
वरना चारों धाम,फिरो बनके तुम रोगी।

ताक़त का मन द्वार है,मन से बाहर भूल।
मन के भीतर रोशनी,स्वर्ग सरिस अनुकूल।।
स्वर्ग सरिस अनुकूल,नरक भोगे मन हारा।
मन काबू कर देख,दोष मिट जाए सारा।
सुन प्रीतम की बात,धोखा है यहाँ आफ़त।
आफ़त सारी दूर,पहचान मन की ताक़त।

आर.एस. बी.प्रीतम
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