कविता · Reading time: 1 minute

सड़क पर संसद

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संसद सड़क पर आने के लिए
ले रहा है जुंबिश भरी अंगड़ाई।
क्या-क्या बताए क्या पता
सड़क को सहलाये क्या पता
हमारे पैरों को तोड़ दे उसमें
या,खुदवा दे गड्ढे हमारे लिए
हमारे ही पैरों से।

सावधान हमें होना है या सड़क को
संसद से ही पूछ लेते हैं।
किसी बहस में उलझा है अभी।
अपनी सुविधानुसार विधेयक ले आता है संसद
इसलिए रूआँसा हो जाता है सारा सड़क।

अपनी बलात्कार और शोषण के गीत
गाता है बहुत।
बलत्कृत हुई औरत के आंसुओं को
रुलाता है बहुत।
गीत में लय,सुर,तान का
गज़ब समंजस्य है।
अरे नहीं, यह न्याय देने का
बहुत भारी असमंजस है।

जो गड्ढा खुदा था वही रोकेगा
विकास।
हमें तो नहीं, उसे बहुत है
विश्वास।
सड़क को तो गड्ढा विकास के पर्यायवाची सा
गुदगुदाता है।
प्रतिनिधियों को योजनाओं का प्रारूप
हँसाता है।

दशकों बाद संसद रहा है छटपटा
बाहर निकल हमारी आँखें देखने को।
जिसमें सपनों की मुरझाई परतें
लालायित है संसद देखने को।
अभी तक तय नहीं हो पाया है कि
सपने संसद के हैं या सड़क के लिए।
और कि सत्र और जमावड़ा निर्णय के लिए है
विचारों में व्यक्त शब्द तड़क-भड़क के लिए।
कविताएं शाश्वत होती हैं हमारे,तुम्हारे लिए नहीं।
विचार बदलते हैं कविताएं नहीं।
—————-14सितंबर21—————————–

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