स्वार्थ

ये जो आसमान आज नीला हो रहा फिर से
धुंधियारा था मैला था कल
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दिवारों में अब तू कैद है
फिर भी ना तुझको मिली अक्ल
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फिक्र है भी तो केवल अर्थव्यवस्था की
फर्ज की नहीं
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क्यों
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तेरे स्वार्थ की हद असीमित हो गई
इतना गिर गया अ मानव
इन्सानियत तेरी खो गई

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निरन्तर सीखना मेरा उद्देश्य सेवा भाव हृदय में है करू मैं देश की पूजा बस...
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