लघु कथा · Reading time: 1 minute

” स्वाभिमान “

हरामखोर ! तनख्वाह मुझसे लेती है और रोटियां दुसरों को खिलाती है गुस्से से आग बबूला प्रेमा अपनी खाना बनाने वाली राधा पर चिल्ला रही थी…छोटी भाभी ( प्रेमा की छोटी बहू ) को ऑपरेशन से बच्चा हुये दस दिन ही तो हुये थे उपर से ऑपरेशन भी खराब हो गया था कुछ टॉके खुल गये थे । दवाइयां खानी थी सो ये सोच उसने पहली रोटी छोटी भाभी को दे दी थी उसे क्या पता था की उसे इसके बदले गालियां मिलेगीं…प्रेमा अभी भी चिल्लाये जा रही थी यहाँ मेरे पति खाने बैठे हैं तुझे उनकी चिंता तो है नही और होगी भी क्यों तुझे क्या पता पति के बारे में तेरे पति ने तो तुझे छोड़ दिया है । राधा ने धीरे से कहा माता जी उसने मुझे नही छोड़ा मैने छोड़ा है उसे बहुत गालियां देता था और गाली मुझसे बर्दाश्त नही होती यह कह उसने गैस बंद किया और दरवाजे की तरफ चल दी ।

स्वरचित एवं मौलिक
( ममता सिंह देवा , 23/09/2020 )

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