Aug 18, 2016 · कविता
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स्वाभिमानी पत्थर

मानव उवाच(कुकुभ छंद)

सुनो कथा पत्थर की भैया,
पत्थर क्या-क्या सहते हैं?
कथा व्यथा है इनकी सच मे,
डरे-डरे-से रहते हैं।।
जिसका भी जी चाहे इनको,
दीवारों में चुनवा दे ।
और हथौड़े की चोटों से,
टुकड़ों मे भी तुड़वा दे।।

पत्थर उवाच(ताटंक छंद)

चोटों की परवाह नही है,
चोटों पर दिल वारा है।
मानवता के काम आ सकें,
ये सौभाग्य हमारा है।।
महल-अटारी-मंदिर-मस्जिद,
नगर-डगर गुरुद्वारा है।
जग में गिरि से लघु कंकड़ तक,
हमसे निर्मित सारा है।।

सूर्य-चंद्र-ग्रह-उपग्रह-तारे,
सब मे अंश हमारा है।
हम ही मणि-मोती हीरा भी,
जो तुझको अति प्यारा है।।
तरु-नर-पशु-खग के जीवन को,
हमसे मिला सहारा है।
चीर हमारा वक्ष धरा पर,
निकली मृदु-जल-धारा है ।।

हे! नर! जग में परहितकारी,
चोटों से कब हारा है?
जन-हित हेतु समर्पित उसका,
होता तन-मन सारा है।।
कटें छटें या तोड़े जाएं,
हमने सब स्वीकारा है।
हर युग में निर्माण नया हो,
ये संकल्प हमारा है।।

रचना-रामबली गुप्ता

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