कविता · Reading time: 1 minute

” स्वागत गान “

तीन दिन बचे हैं ,
बरस की बिदाई में !
अच्छा लग रहा है ,
झीनी सी परछाई में !
दीवार पर टँगा कैलेंडर ,
फड़फड़ाता हुआ ,
चिढ़ा रहा है मुझे ,
मुस्कराता हुआ !
बारह पन्नों में ,
लटके बारह माह !
तीन सौ पैंसठ दिनों की ,
बुझी , अनबुझी चाह !
कह रहा है मुझसे ,
तुम्हारे अंतर्मन को जानता हूँ !
देख रहा हूँ ,
तुम्हारे चेहरे पर छाये डर को ,
पहचानता हूँ !
तुम बीते कल से नहीं ,
आने वाले कल से आक्रांत हो !
भविष्य की मुट्ठी में बंद ,
परिणामों से अशांत हो !
और मैं मौन , चतुरता से ,
अपना अनकहा अभिव्यक्त नहीं करता !
जुट जाता हूँ , संयोजन में ,
भविष्य के ,
अनुरक्त नहीं रहता !
बीते बरस को भी मैंने ,
बिठाया है पलकों पर !
आने वाला कल भी ,
नहीं होगा मुचलकों पर !
स्वागत है आगत का ,
विगत की विदाई !
पलकों पर बैठी है ,
कल की अगुआई !!
न ही कोई डर है ,
न ही कोई चिंता !
जो होगा बेहतर है ,
उड़े मन ज्यों ,
उड़े है परिंदा !!

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