“स्वप्न”

स्वप्न बेपरवाह होते हैं,
अनियमित होते हैं.
स्वप्न खंडित होते हैं,
रंगीन होते हैं.
स्वप्न कुछ तलाशते हैं,
और हम भटक जाते हैं.
मंजिल तक पहुँचने से पहले,
यथार्थ के धरातल पर पटक देते हैं.
मैंने भी कल एक स्वप्न देखा,
कुछ काला, कुछ रंगीन.
डूबती हुई कश्ती,
उड़ता हुआ पंक्षी.
नीला आसमान और,
मंदिर की घंटी.
जाने किस तलाश में , मैं भी भटकी,
तभी अचानक निद्रा टूटी.
स्वप्न-यथार्थ के मन्थन में,
आशाओं की लडियां छूटी.
…निधि…

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको" View full profile
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