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स्वप्न

हो कुछ ऐसा स्वप्न ।
चाहे हो दिवा स्वप्न ।।
सिर्फ हर तरफ शान्ति ।
तनिक भी नहीं भ्रान्ति
न राग हो न द्वेष हो।
मनुज से मनुज का केवल समावेश हो।।
ऐसा संसार ।
जहाँ हो खुशियाँ अपार।।
न कोई विभेद ।
न कोई क्लेश ।।
मनुज मनुजता से हो परिपूर्ण ।
मैं ऐसे स्वप्न की रखता हूँ चाह।
हो जिसमें परिश्रम की राह।।
न दुराचार न व्यभिचार।
केवल और केवल सदाचार।।

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Bharat Bhushan Pathak
Bharat Bhushan Pathak
DUMKA
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कविताएं मेरी प्रेरणा हैं साथ ही मैं इन्टरनेशनल स्कूल अाॅफ दुमका ,शाखा -_सरैयाहाट में अध्यापन...
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