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स्याह दीवारें !

Neeraj Chauhan

Neeraj Chauhan

कविता

August 12, 2017

अपनी धरती के क्षितिज से
कही भी देखता हूँ,
कीड़े-मकोड़े सी भागमभाग दिखती हैं
संबद्धता कहीं नहीँ,
सब टूटे दिखाई देते हैं
कोई बाहर से,
कोई अंदर से

बिजली के तार को पकड़ते
सभी में भय व्याप्त है
यहाँ खिलखिलाते दिलों की सतह
लाल मखमल सी लगती है
जो हाथ रखने पर
कालिख़ पोत देती है

उस दिवार पर चढ़ने को
सब उतारू हैं
जो बाहर से लुभावनी है
अंदर से नितांत स्याह !

– नीरज चौहान
(काव्यकर्म से अनवरत)

Author
Neeraj Chauhan
कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।
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