स्याही

उस वक्त प्राथमिक विद्यालय से उच्च विद्यालय पहुंचने के बीच एक बोर्ड की परीक्षा की दीवार होती थी। उसको फलांगने पर ही उच्च विद्यालय में प्रवेश मिलता था। राज्य स्तर की ये परीक्षा काफी महत्वपूर्ण समझी जाती थी।

इसके पहले की परीक्षाओं का अनुभव ये था कि प्रश्नपत्र कभी मिले तो मिले ,नही तो शिक्षक ने ब्लैक बोर्ड पर ही ५-७ प्रश्न लिख दिए। उनके उत्तर कॉपी में लिखकर जमा करा देते थे। आगे की शिक्षक जाने । हस्तलिपि समझ आयी तो ठीक, न आयी तो हम क्या कर सकते थे?

ये जरूर याद है कि कक्षा 2 में पहली बार स्याही वाले पेन से सामना हुआ था। जिसकी निब कितनी बार तोड़ी थी याद नहीं। कलम की स्याही भरते वक्त न जाने कितनी बार छलकी होगी।

कलम के रुक जाने पर उसे दांतो से खींच कर निकालना , फिर साफ करके दुबारा लगाना, ज्यादा स्याही आ जाने पर कलम को छिड़क कर निब पर उसकी मात्रा को दुरुस्त करना ताकि लिखावट मोटी न लगे।
स्कूल में कलम से इस जद्दोजहद में, उंगलियों, मुँह , होठों पर स्याही के निशान रोज लेकर ही घर लौटते।

और किसी शैतान छात्र का दिल किया तो कलम की निब को पीछे से कमीज में स्पर्श करा दी, कमीज भी एक दम प्यासी सी स्याही पीने लगती थी।

शाम को घर लौटने पर , शक्ल देखकर ही घरवालों को ये यकीन हो जाता कि आज विद्यालय तो गया है।

बांग्ला में एक कहावत भी थी उस वक्त कि

“हाथे काली मुखे काली
देख माँ आमी पोढ़े आली”

(मेरे हाथ और मुँह मे स्याही लगी है, देखो माँ मैं पढ़ कर लौटा हूँ)

परीक्षा के एक दो दिन पहले एक स्याही की टिकिया भी दी जाती थी, जिसे पीस कर खाली दवात मे डालकर ,फिर उचित मात्रा में पानी डालकर, स्याही निर्मित की जाती।
कक्षा 2 -3 के बच्चों को रसायन शास्त्री मान लिया जाता कि वे घर जाकर स्याही बना ही लेंगे। मैं कभी वो स्याही ठीक तरह से नहीं बना पाया। और अगर बन भी जाती तो लिखावट इतनी हल्की होती कि पढ़ने योग्य नहीं होती।

मेरे एक सहपाठी ने तो उस टिकिया को मुँह में ही घोल लिया, वो उसे खाने की चीज़ समझ बैठा था। बाद मैं कुल्ला करने और जीभ साफ करने के बाद भी ,जीभ नीली ही रही उस दिन।

बोर्ड परीक्षा से पहले दीदी ने मेहनत तो बहुत करवाई थी,

बंगाल और भारत के कुछ शहर, जिनका पहले नाम भी नहीं सुना था, कहाँ है और र्क्यों प्रसिद्ध है? सबको कंठस्थ करा दिया था।

सिकंदर और पोरस का युद्ध , झेलम नदी, एक राजा का दूसरे राजा के साथ युद्ध के बाद न्यायोचित व्यवहार इत्यादि को रट कर
,
यदु के आठ आमों में से 2 मधु को देकर , कितने बचे और न जाने कितने अंग्रेज़ी शब्दो की स्पेलिंग याद करके , अब अपने पहले किताबी रणक्षेत्र में जाने को प्रस्तुत था।

सतर्कता के लिए दीदी ने अंग्रेज़ी के १२ काल(टेंस) भी इस छोटे से दिमाग में कूट कूट कर बैठा दिए थे।

ये पहली बार था कि किसी दूसरे विद्यालय में जाकर परीक्षा देनी थी।
बोर्ड परीक्षा जो ठहरी।

एक पेंसिल बॉक्स, गत्ते का बोर्ड जिसके ऊपरी भाग में एक कागज पकड़ने वाली चिमटी, जिसने अभी एक स्केल को दबोच रखा था, को हाथ में लेकर थोड़ा अजीब सा लग रहा था।

माँ ने नहला धुला कर ,बालों को कंघी करके भगवान को प्रणाम करवा कर, सभी बड़ों के पांव छूने को कहा।

फिर कपड़े वाले सफेद जूते पहनकर जब मझले भाई के साथ घर से निकला तो एक वीर योद्धा की सी अनभूति हो रही थी।

घर की गली से निकल कर सड़क पर पहुंचते ही दूसरे किसी विद्यालय के एक विद्धार्थी पर नज़र पड़ी, उसने चमड़े के चमचमाते काले जूते पहन रखे थे, उन जूतों पर बहुत देर तक नज़र टिकी रही।

आज दो परीक्षायें होनी थी। पहले भाग मे हिंदी और दूसरे भाग में अंग्रेज़ी।
बीच में एक घंटे का भोजन के लिए अवकाश था।

भाई ने कह दिया था कि दोपहर में मेरे लिए टिफ़िन बॉक्स ले आएगा और अंग्रेज़ी की पुस्तक भी ताकि उस एक घंटे के दौरान सरसरी तौर पर महत्वपूर्ण हिस्सों को, गौर से फिर नज़र डाल सकूँ।

घंटी बजने के साथ ही हिंदी का प्रश्न पत्र मिला। उत्तर पुस्तिका पर अपना नाम, विद्यालय का नाम, विषय और रोल नंबर लिखने के बाद। जब प्रश्न देखने शुरू किए तो किन्हीं ६ प्रश्नों के उत्तर देने थे, पहला प्रश्न अनिवार्य था।

पहले प्रश्न में पांच रिक्त स्थानों की पूर्ति करनी थी और दो तीन विकल्प भी बगल मे लिखे हुए थे।

मैं तो पहले रिक्त स्थान की पूर्ति में ही अटक गया।

लिखा था, सूरज पूर्व से पश्चिम की ओर जाकर अब ………. हो चला था। विकल्प थे, शांत/क्लांत।

सही उत्तर तो पता लगा कि क्लांत था।
पर मुझे न जाने क्यों शांत ज्यादा जंच रहा था। मेरा तर्क ये था सूरज की गर्मी से तो हम क्लांत होते हैं, वो तो हम लोगों को झुलसाकर अब अपना क्रोध शांत करके पश्चिम की ओर अग्रसर था।

पर मेरे तर्क को कौन मानने वाला था। पता नहीं उसमे मुझे नंबर मिले की नहीं।

जिंदगी का ये पहला इम्तिहान देकर जब निकला तो भाई गेट के बाहर खड़ा मिला। बाकी सब उत्तर तो ठीक लिखे थे, बस सूरज को शांत कर दिया था जबकि उसे तो क्लांत होना था।

पर मेरा 9 वर्षीय दिमाग सूरज को क्लांत मानने को तैयार नही था!!!!

टिफ़िन बॉक्स खोलते वक़्त देखा उसमें पेड़े गायब थे, माँ ने पक्का वादा किया था कि सब्जी रोटी के साथ वो भी जरूर होंगे। भाई को पैसे भी दिए थे कि पास की हलवाई की दुकान से लेकर उसमे रख दे। वो जल्दबाज़ी में पेड़े लेना भूल गया।

मैं आज से एक दो साल पहले की घटना याद कर रहा था, जब उसकी 9 वीं की परीक्षा में कैसे नकल कराने अंग्रेजी की पुस्तक लिए उसकी स्कूल के पिछले गेट पर खड़ा था। वो भी भाग कर पहुंचा था वहाँ।

अंग्रज़ी की पुस्तक एक हाथ में लेकर, दूसरे हाथ से निवाला मुँह में डालते हुए , भाई की ओर प्रश्नवाचक नज़र से देख रहा था कि बात तो पेड़े की भी हुई थी।

भाई ने आश्वासन दिया कि कल वो ऐसी गलती नहीं करेगा,

तब जाके कहीं निवाला गले से उतरा!!!

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