"स्मृति"

वासन्ती पुष्पों ने फिर से,
लायी भीनी -भीनी सी सुगंध,
अमवा की डाली से होकर ,
पुरवा का झोंका मंद-मंद,
सखी लो फिर से आया,
ऋतु मृदु मधु वसंत,
दूर कहीं पर छूट गयीं,
बचपन की सखियाँ,
अब तो अच्छी लगती,
पीहर की गलियाँ,
स्मृति के झुरमुट से,
झांका फिर कोई चेहरा ,
धुंधलाया सा ,मुस्काता सा,
झूम उठा आतुर मन मेरा,
कौन कहेगा कौन सुनेगा,
अब तो सब कुछ छूट गया,
ममता की छाँव नहीं अब ,
ना बाबुल की बतिया,
रह -रह कर मन रोता है ,
फिर भी हँसती रहती हूँ ,
बच्चों की किलकारी में ,
सपनों की दुनिया बुनती हूँ ||

…निधि…

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
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