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स्थानीय भाषा में लोकगीत

Feb 4, 2017 12:25 AM

चला चली पानी भरी आई…
मटकिया अप ने उठाई l

ई मटकी मां जान मेरी अटकी….
जाने कब फूटी जाई l…. चला चली …..

पनघट पर छेड़ नंद का लाला ….
बैठ कदम की डारी l …. चला चली..

ग्वालों की नियति यहां अटकी . ..
लुटी जाए ना जीवन की कमाई l…. चला चली ..

जो जल से भरी जाइ ए मटकी ……
भवसागर तरी जई l….. चला चली…..

जमुना में डूबत चटक गई मटकी ……
मोरी गागर सागर में समाई l…… चला चली..

संजय सिंह “सलील “
प्रतापगढ़,उत्तर प्रदेश I

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संजय सिंह
संजय सिंह
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सिविल इंजीनियर हूं, लिखना मेरा शौक है l गजल,दोहा,सोरठा, कुंडलिया, कविता, मुक्तक इत्यादि विधा मे...
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