स्त्री : दोहों में

**स्त्री : दोहों में **
// दिनेश एल० “जैहिंद”

बात कहूँ मैं गूढ़ अब, भारी नर पर नार ।
हारे जब नारी कहीं, होती नर की हार ।।

माय सदृश कोय नहीं, नहीं मातु का जोड़ ।
सारे नाते इक तरफ, _नहीं माय का तोड़ ।।

छाया कन्या शक्ति की, _दुनिया करे गुमान ।
नारी वंश विस्तार कर, करे जगत कल्यान ।।

नारी से नर शोभता, _बढ़ जाता है मान ।
बनता उसका फर्ज है, दे उसको सम्मान ।।

होके शिव की तू शिवा, करे सृष्टि विस्तार ।
तुझ बिन सृष्टि शून्य है, निरर्थक है संसार ।।

मन में आज प्रश्न उठा _नारी काहे रोय ।
हर प्रानी का भूमि पर, जोड़ा काहे होय ।।

दीदी, चाची, नार से, मिले सबको दुलार ।
देखो नारी रूप में, _ छुपा हुआ बड़ प्यार ।।

औरतों में देख छुपी, _ बौद्धिक क्षमता गूढ़ ।
चेत जाओ अब मर्दो, ___स्त्री नहीं है मूढ़ ।।

“जैहिंद” कहे आप से, _ बड़े पते की बात ।
पूजनीय हर रूप में, __नारी की ये जात ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
20. 01. 2018

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