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** स्तुति **

Ranjana Mathur

Ranjana Mathur

अन्य

November 7, 2017

अति रमणीक है हृदय का उपवन
अधिष्ठाता जिसके प्रभु स्वयं आप।
अन्तर्मन की वाणी तुम सुनते
नहीं सुनते तुम मिथ्या आलाप।
यदि हूँ मैं पथभ्रमित तो दाता
दो परमेश्वर तुम मुझे संताप।
या सत्मार्ग पर ला दो मेरे भगवन
दे दो मुझे अपने आशीषों की थाप।
तुम ही, तुम ही, तुम ही हो ईश्वर
मेरे करतार, मेरे मां-बाप।

–रंजना माथुर दिनांक 07/11/2017
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना ©

Author
Ranjana Mathur
भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से ही सर्व प्रिय शौक - लेखन कार्य। पूर्व में "नई दुनिया" एवं "राजस्थान पत्रिका "समाचार-पत्रों व " सरिता" में रचनाएँ प्रकाशित। जयपुर के पाक्षिक पत्र... Read more
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