कविता · Reading time: 1 minute

सौन्दर्य

अहा कौन तुम
स्वप्न सुन्दरी
चन्द्र कला में रमी हुयी
शान्त निशा
की मधु उपवन सी
चन्द्र चन्द्रिका जमी हुयी

छिटक चाँदनी
पुष्प पल्लवित
शांत झील नीलांचल पट
शशि छाया
उन्मुक्त वेदिका
स्वप्न लोक क्रीड़ांगन तट

तुम रचना
की प्रथम पँक्ति सी
मचल उठी ज्यों कोकिल गान
उतर रही
घूँघट पट खोले
खिली चाँदनी सी मुस्कान

कविता के
आवारा शब्दों सी
इठलाती बल खाती
यूँ इतराती
मन भरमाती
मदमाती सी लहराती

रतनारे
चञ्चल नैनों का
जादू भरा तरल संघर्ष
संसय की
धूमिल पगडंडी
या फिर सावन का स्पर्श

हो पेंचो
खम से भरी हुई
बैरागी मन की सी कविता
या सावन
के गलियारों सी
लहराती बलखाती सरिता

वर्षा मेह
सदृश आच्छादित
श्यामल गहन सघन घन केश
सुर्ख कपोल
उषा का आगम
देव कामिनी तन परिवेश

Kuber Mishra

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