Jul 23, 2016 · कविता

सोचती हूँ.....

सोचती हूँ
किसी दिन पी लूं
तुम्हारे होठों की मय
एक ही सांस में
और कूद जाऊं
तुम्हारी आँखों की
पनीली झील में
तुम पुकारो मुझे
मेरा नाम लेकर
और मैं घुल जाऊं
तुम्हारी साँसों की
गहरी नील में ….!
© डॉ प्रिया सूफ़ी

1 Like · 2 Comments · 31 Views
हम फकीरों का बस इतना सा फ़साना है, न अम्बर मिला न ज़मीं पे आशियाना...
You may also like: