कविता · Reading time: 1 minute

सैनिक की जिंदगी,

दिवाली पर न आऊँगा, उमंगों को सुला देना
नहीं मिल पाई है छुट्टी अकेले घर सजा लेना
यहाँ सरहद पे हम मिलकर बमों को खूब फोड़ेंगे
हमारे नाम के दीपक वहाँ तुम ही जला लेना

सफर अब पूर्ण होता है, मुझे हँसकर विदा करना
हमारी याद आए तो, कहीं छिपकर के रो लेना
अकेले पन का जीवन में तुम्हें अहसास हो जब भी
गुजारे साथ जो लम्हे उन्हीं को याद कर लेना

आँसू पोंछ लो माँ तुम नहीं तुमको रुलाऊँगा
बड़ा होकर वतन के वास्ते सेना में जाऊँगा
मैं दुश्मन को उसी के घर में घुसकर ही मिटा दूँगा
अधूरा काम पापा का मैं पूरा करके आऊँगा

श्रीकृष्ण शुक्ल, मुरादाबाद।

27 Views
Like
You may also like:
Loading...