सृष्टि की उत्पत्ति (भाग-१)

एक समय महाविष्णु अकेले, गहरे शून्य में सोए थे
हलचल होती थी मन में, कुछ मंथन में वे खोए थे
आया विचार सृष्टि रचने का, गहन और गंभीर हुए
सोचा घने अंधेरे में, मैं शांत शून्य रहता हूं
कुछ तो क्रीडा करूं आज, कुछ नया बना लेता हूं
उस मंथन से महाविष्णु के, अति भयंकर नाद हुआ
अतिशय एक प्रकाश पुंज से, ब्रह्मा विष्णु महेश हुए
फिर बोले सर्वेश्वर उनसे, नई सृष्टि एक बनाओ
ब्रह्मांड विभक्त हो जाओ, पिंड से अगणित पिंड बनाओ
अद्भुत सृष्टि करो ब्रह्मा जी, विष्णु पालन करेंगे
महेश होंगे जगत नियंता, और संहार करेंगे
महाविष्णु की इच्छा से, शिव ने जोर का नाद किया
खंड खंड हो गई वह काया, जिससे धरती सूरज चांद बना
बिखर रहे टुकड़े काया के, दसों दिशा में जाते थे
धरती आसमान और तारे, पल भर में बन जाते थे
धरती नवग्रह और तारागण, उस महा शून्य में आए
शिव के उस प्रचंड नाद से, आपस में सब टकराए
शंकर का घनघोर नाद जब, धीरे धीरे शांत हुआ
निकली जब ओंकार ध्वनि, शिव का मन शांत हुआ
किया संतुलन और शिव बोले, आपस में मत टकराओ
अपनी अपनी परिधि में, अपनी गति से हो जाओ
टकराने से उत्पन्न ऊष्मा, अद्भुत प्रकाश फैलाती थी
होती थी घनघोर गर्जना, दसों दिशा थर्राती थी
ऊष्मा और घनघोर गर्जना, काले मेघों को लाई
जलमग्न हुई सारी धरती, जो मेघों ने बरसाई
समय बहुत लग गया, धरा को ठंडी होने में
ऊंचे ऊंचे बने पहाड़, तब्दील हुई मैदानों में
सप्त खंड नवदीप बने, सप्तसागर लहराए
कई निकल पड़ी सरिताऐं, रेगिस्तान बनाए
कहीं पर ठंडी कहीं गरम, फिर चलने लगी हवाएं
सृष्टि कर्ता ने सबसे पहले, वनस्पति उपजाए
नाना नाम रूप के, नाम कोई न कह पाए
जलचर थलचर नभचर नाना, ब्रंम्हा ने जीव बनाए
किया धरा श्रंगार, जो ब्रह्म को बहुत लुभाए
हुई ब्रह्म की इच्छा, इस रमणीय धरा पर आने की
निज शरीर से प्रकट किया, अद्भुत जोड़ी मानस की
जाओ पंचमहाभूत के पुतले, जाओ धरा पर जाओ
करो नई सृष्टि धरती पर, प्रेम की दुनिया नई बसाओ
दे दिया है तुमको बुद्धि विवेक, तुम धरती पर रह पाओ
समन्वय के साथ धरा पर, सबको सुख पहुंचाओ
स्वार्थ को सीमित रखना, तुम हर जीव को सुख पहुंचाना
रखना ख्याल तुम जल जंगल का, धरती को दुख न पहुंचाना

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