****सृजन ही मेरी डगर****

चार सुबह के चार रात के
होते आठ पहर
जागता रहता भगता रहता
सृजन ही मेरी डगर
उलझन में तू ,मन उपवन में तू
रखता साहित्य तेरी खबर
अंखियों में निंदिया भी आती
मस्तिष्क पटल को राग सुनाती
इसकी ही बस्ती में बसा है
सृजन ही तेरी डगर
कविता छंद सोरठा गाऊं
विरह मिलन के गीत सुनाऊं
चलती रहेगी जब तक चलेगी
लाएगी कलम हर पल नई लहर
सर्जन ही मेरी डगर
मां नेजब वरदान दिया
प्रभु ने यही काम दिया
क्यों भटकू या फिर अटकू
“अनुनय” जाऊं न कहीं ठहर
सृजन ही मेरी डगर ।।*।।
“राजेश व्यास अनुनय

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