*****सूरज से थोड़ी सी गप्पें****

*दूर हो खूब मगर
हमें जलाकर चले जाते हो
क्या खाते हो ?
जो इतने गर्म तुम नज़र आते हो

*कैसे कपड़े पहनते हो?
जो चमकते ही जाते हो
उषा की किरणें हम पर
सदा यूँ ही बरसाते हो

*हो तो तुम गोल
कैसे मानू ?
देखने ही नहीं देते
चमकते ही रहते हो
चमकने से बाज़ भी नहीं आते हो

*रात में पता नहीं
कहाँ चले जाते हो ?
तुम तो चले जाते हो
और अपने साथ
सारा नीला आकाश भी ले जाते हो

*ढूँढने पर भी नहीं मिलते हो
सारी रात गुजर जाती है
यूँ ही आँखों-आँखों में
उषा की पहली किरण के साथ
प्रातः बिना कुछ कहे निकल आते हो

*फिर यूँ ही पूरा दिन
हमको जलाते हो
गरमी और धूप देकर
तुम हमें बहुत ही सताते हो, ||||||
तुम हमें बहुत ही सताते हो, ||||||

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