सूनी कलाई

माँ क्यू सूनी है मेरी कलाई क्यूँ सूना है अपना अंगना बोलो ना माँ
माँ बोलो ना कहाँ है मेरी बहना ….हर घर में रक्षा सूत्र लेकर आई है बहना
फिर क्यों नहीं चहका अपना अंगना
काश मैं भी होता प्यारी सी बहना का भाई तो क्या सूनी रहती मेरी कलाई ..?
माँ से उत्तर न पाकर पूछा उसने दादी माँ से बोलो ना कहाँ है मेरी बहना ….?
दादी को तो जैसे सूंघ गया हो साँप क्योंकि स्वयं ने किया था घोर पाप
इक मासूम के खून से रंगे थे हाथ कैसे कुबूल करे वो अपना अपराध
भाई ने इतने प्रशनो की झडी लगाई किसीको कुछ कहते हुए न बन पाई
किया साहस भीगी पलकों से झुकी नजरों से कहने लगी ताई
बेटा चुप हो जाओ ना करो हमें मजबूर इस घर का बङा बेरहम है दस्तूर
मेरे भी घर इक बिटिया आई थी मगर इस खानदान को जरा भी ना भाइ थी
मार दिया गया उसे लेते ही जनम कोई नहीं समझ सका माँ का मरम
यहाँ अपराध समझा जाता है बेटी का जनम ना इसीलिए सूना है अपना अंगना
भाई सहम सा गया मगर उससे रहा ना गया कहा उसने अपनी माँ से
माॅ तुम तो नहीं रहीं कभी मजबूर फिर तुमने क्यों निभाया दस्तूर
माँ की जगह फिर बोली ताई बेटा मैंने तो बेटी को जन्म देकर मारा था
तेरी माँ ने तो उसे दे दी कोख में ही विदाई जनम लेने से पहले ही वो हो गई पराई
काँप उठी भाई की आत्मा तिलमिला उठा मन पैदा होते ही क्यों मारा दी जाती है बहन
मन सोचने को हुआ मजबूर क्यो इतना क्रूर है इस घर का दस्तूर
बालमन फिर से मचल उठा फिर से वो पूछने लगा बताओ न दादी कौन बंधेगा मुझको राखी
किसने दिया आपको ये अधिकार कि छीन लें मुझसे मेरी बहन का प्यार
किसके संग खेलू मैं होली किसकी मैं उठाऊंगा डोली …?
हिम्मत करके दादी बोली हाँ मैंने ही किया सबको मजबूर मैंने ही बनाया ये दस्तूर
क्योंकि बेटों से चलती है पीढियां होता है प्रपौत्र तो चढता है सोने की सीढियां
और पहुंचा देता है स्वर्ग देकर बेटी को जन्म क्यों भुगते हम नर्क इसीलिए करते है बेटे और बेटी में फर्क
भाई के दिल पर लगी हथोङे- सी चोट मगर ठान ली उसने बदलकर ररहेगा वो दादी की सोच
बदलकर रहेगा वो दादी की सोच …..

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