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सूना सूना-सा झूला

दिनेश एल०

दिनेश एल० "जैहिंद"

कविता

August 13, 2017

सूना सूना-सा झूला
// दिनेश एल० “जैहिंद”

एक तो चाँदनी रात और उस पे अकेला झूला ।
कहाँ हैं सारी सखियाँ, क्यूँ मुँह उनका है फूला ।।

क्यूँ साजन बिन झूला झूलन को निक ना लागे ।
सूना झूला, सूनी सेज व ये बैरन अँखियाँ जागे ।।

सुंदर हिंडोला, सुहावन रीतु से वंचित बालाएं ।
सावन के लुभावन मौसम क्यूँ नहीं उनको भाए ।।

मन क्यूँ है बोझिल, मन की ललक बूझी-बूझी-सी ।
छाया क्यूँ सन्नाटा नीम तले आत्मा क्यूँ है दुखी-सी ।।

मेघा गरजे रिमझिम बरसे लुभाए नाहिं फुहार ।
सावन पुकारे आओ प्यारे क्यूँ भाए नाहिं पुकार ।।

+++++++++++++++
दिनेश एल० “जैहिंद”
13. 07. 2017

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Author
दिनेश एल०
मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का... Read more

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