सूखे पत्ते

वो सूखे पत्ते *पलाश* के ।
टूटे सितारे आकाश से ।
खोजते रहे जमीं अपनी ,
कल तक जो थे साथ से ।

क्यों तरसती रहीं निगाहें ,
उजाले थे वो आभास के ।
क्यों टूटते रहे वो घरौंदे ,
जो घरौंदे थे विस्वास के ।

न रूठकर भी रूठे रहे ,
वो हमसफ़र भी खास से ।
जीते रहे वास्ते जिनके ,
वो अंजान रहे इस बात से ।
…. विवेक दुबे”निश्चल”@…

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