Jul 1, 2017 · कविता

सूखा पत्ता

वो भी कभी बहारों का
हुआ करता था हिस्सा
गिरा पड़ा था सड़क पर
जो सूखा निर्जीव पत्ता ।

प्रकृति ने साथ दिया नही
जडों ने पोषण किया नही
चंद दिनो मे मुरझा गया
हरा भरा था जो सजीव पत्ता ।

बड़ा हुआ था जिस शाख पर
उसी ने दामन छुड़ा लिया
पतझड़ का समय हुआ
गिराया डाली ने कमजोर वो पत्ता ।

हवा ने मौका देखा
दूर उड़ा के उसे फेंक दिया
विलीन हो गया धुंए मे
जब जलाया किसी ने वो बेबस पत्ता ।।

राज विग

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Working as an officer in a PSU. vigjeeva@hotmail.com
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