कविता · Reading time: 1 minute

चमकती हुई ‘रौशनी’…..

सभी रिश्तों से हसीन,
पर होती है कमसीन।

है निः स्वार्थ भाव ध्येय,
निश्छल लुटाती स्नेह।

बहसबाज़ी,लड़ना,झगड़ना,
बिना इसके न कोई काम है करना।

ताने वो मुझे मारती,
ये सब कर वो लाड जताती।

बोल – बोल मेरा सिर खाती,
बिन इसके,मैं रह न पाती।

मेरी टाँग सदा है खिंचती,
इसमें अपना स्नेह है मिचती।

बात किए बिन, चैन न आता,
इतना स्नेह समा भी न पाता।

गर एक पल बात न होती,
छुपकर ज़रा सा मैं रो लेती।

बिन बोले आँखों से होकर,
हम समझते मन की बातें।

गर दोनों एक साथ ने बोला,
इसमें भी है एक झमेला।

आँख मूँदकर कुछ तो माँगों,
प्रेम बहनों का तुम पहचानों।

रिश्ता ये बेहद खूबसूरत,
तुम तो हो स्नेह की मूरत।

आज मैं तुमको याद करके,
लिख रही फ़रियाद करके।

रौशनी है नाम तुम्हारा,
फैलाओ जगत उजियारा।

उम्मीद है,तुम ये करोगी,
लक्ष्य की उड़ान भरोगी।

सोनी सिंह
बोकारो(झारखंड)

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