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सुबह का सूरज

गांव में आज भी घर के आहते से ड्योढ़ी से या गली के दायिनी छोर से उसे साफ-साफ देखा जा सकता है। सुबह से शाम तक जाने कितनी मर्तवा उसे देखा जाता है कभी सुर्ख तो कभी ..!ख़ैर यह सब गांव में ही देखा जा सकता है चूंकि शहरी जीवन में सुबह के उगते सूरज को देखना सबके नसीब में कहां फिर लंबी-लंबी इमारतों में बने छोटे-मोटे दरबे जहां जीवन तो जैसे तैसे जीया जा सकता है पर सुर्ख सूरज को नहीं देखा जा सकता।अब जब रात को लोग उल्लुओं की तरह जागते हैं शायद दो बजे तक तो फिर अच्छी सुबह कहां से नसीब हो।दिन भर ऊंघते रहना या मोबाइल में स्वयं को व्यस्त रखना बस यही दिनचर्या है और आऊटपुट के नाम पर ठेंगा!!
मनोज शर्मा

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मनोज शर्मा
मनोज शर्मा
दिल्ली
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हिन्दी लेखक एवम् कवि असिस्टैंट प्रोफेसर गैस्ट अदिति महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय एम ए हिन्दी उर्दू...
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