सुनो न

काश कभी तो ऐसा होता

तुम समझ जाते बिन कहे
मेरे दिल का हाल ।
न कह पायी जुबां वो दर्द
जो तुम कभी सोच भी न पाए

वो बारिश का आना
उम्मीदों का फिर से जाग जाना
कहोगे तुम कभी तो आओ
आज साथ मे भीगते हैं ।

खो जाती हूँ फिर से कल्पना में
तुम्हारे हाथों में हाथ डालकर
झूम रही हूँ मै हल्की बारिश में
थाम रहे हो तुम मुझे अपनी बाहों में ।

वो आसमान में बादलों से झांकता हुआ
चाँद भी चाँदनी के साथ मगन हो रहा है
निहार रही है चाँदनी भी अपलक चाँद को
आओ न हम भी छत पर चलते हैं ।

सो जाओ अब सुबह जल्दी जाना है
सिर्फ मुझसे दूर रहने का रोज का बहाना है ।
दुनिया की भाग दौड़ से हटकर हक़ीक़त में आओ
जरा जिंदगी को करीब से महसूस तो करो ।

भूल जाओगे सारी रंजिशें और गीले शिकवे
हसरतों को जरा साँस तो लेने दो ।
जीने दो मुझको तुम्हारी महकती साँसों के साथ
क्या पता कल जिंदगी का ये हसीन दौर हो न हो ।

चलो तारों को अठखेलियां करने दो
आसमान को भी जरा अकेले रहने दो ।
जी लो जिंदगी की आखिरी शाम तो सुकून से
जरा ‘वर्षा ‘की नजरों से दुनिया को देखो तो सही ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

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