सुनहरे पल

वो हर लम्हा
सुनहरा होता है
जो अनुरूप हमारे
साथ खड़ा होता है
न रंग, न रूप
न ही भेद कोई
समय भी कोई
ख़ास नहीं होता
कभी चाहकर
भी नहीं मिलता
कभी बिन चाहे
मिल जाता है
यद्यपि सोचें और
करें मनन तो
हर पल सुनहरा
ही होता है
मानों तो है
न मानों तो नहीं
कभी जब डूबें
हो दूर गहराई में कहीं
उस क्षीण पल में भी
खुशियाँ अपार होती है
समझ कर अगर
कर लो पार तो
और खुशियाँ हज़ार् होती हैं
पल-पल को
हर पल से जियो
जिस जहाँ हैं हम अभी
तरसते हैं कई
यहाँ तक आने को
और कई तो
पहुँचते तक नहीं
इसीलिये जियो दिल से
हर लम्हें को
शायद यहीं
सुनहरा बन जाए !!

– —————बृजपाल सिंह !

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