सुनलो कृपा निधान

काम गया रोटी रुठी , आफत में है जान ।
बिन ब्याही सुता बैठी ,सुनलो कृपा निधान।।

दुःखो के कूप गहरे , दूजे लगे पहरे ।
झांके नहिं अन्धे बहरे, आए दिवस सुनहरे।।

दीन की रोजी छूटी , मन का खोया चैन ।
जोरु कहें क़िस्मत फूटी, कहा कटे दिन रैन।।

निज शाला के मास्साब ,हुए सबै बेकार ।
मिलती नहीं है पगार , बच्चें रोए बेजार ।।

पगडंडी पूछें पथिक , कहां जाएगा यार ।
गांव की आधी तज , जाना है बेकार ।।
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रचनाकार- शेख जाफर खान

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