Mar 3, 2017 · कविता
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सुख-शांति की तलाश

सुख-शांति की तलाश!
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ना जाने कैसे रुकेगा
रक्त -पात, खून-खराबा ?
भटकती यह नई पीढ़ी!
न जाने किस ओर जा रही है ?
चरस,हीरोइन और गांजे की
लत,”नशे में बेहोश लड़खड़ाते,
उनके कदम,ना जाने क्या
प्रदर्शित करना चाहते हैं?”
“आधुनिक” होने का ढोंग-
करते-करते गर्त में गिरते जा रहे हैं।
दूसरी ओर गांव से शहर की ओर
भागता आदमी शायद भूल रहा है
कि जो शांति गांव में है,
वहीं शहर में लोगों को नींद हराम है।
बाहरी चमक -दमक से आकर्षित
होना कहां तक उचित है?
अपनी निराशा छुपाए
कुछ खोज रहा है ।
“दिवास्वप्न”देख एकांत लंबा,
सुनसान रास्तों पर चल रहा है।
उजड़े हुए घर ,सहमे हुए से लोग
उसकी नजर से परे हैं।
“इच्छाशक्ति” शायद उसकी
कभी कम ना हो ।
वह अब “आधुनिक” कहलाना
पसंद करता है।
उस के चटकीले वस्त्र
“सभ्यता के नारे “बार-बार
कानों से टकराते,
वापस लौट जाते हैं।
“अनन्त एश्वर्य “की तलाश में
अमीर बनने की चाह ने
गांव की मिट्टी को ही भुला दिया है ।
लेकिन वह आज अपने पर
हंस रहा है।
उसका अपनत्व उजड़ गया है
यथार्थ क्या है ?
लोग बाहरी हमदर्दी दिखाते हैं,
जो उससे कुछ पाना चाहते हैं
पर उसे अपना कहने वाला कोई नहीं।
आज भी वह सुख-शांति की
तलाश में भटक रहा है।

संतोष भावरकर “नीर
जिला-नरसिंहपुर (म.प्र.)

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