कविता · Reading time: 1 minute

सुकून की चाह

जाना चाहता हूं मैं
किसी ऐसी जगह
जहां मिले सुकूं और
मिले अब चैन मुझे।।

न हो ख्याल किसी का
और न दर्द दिल में
है इंतजार, कोई जगह
अब ऐसी मिले मुझे।।

हो बस खुला आसमां
और चले हवा सुहानी
देखता रहूं मैं तारों को
और शर्माता चांद कभी।।

अब मैं चाहता नहीं कुछ
देखता रहूं इन लहरों को
करें मुझपे विश्वास ये भी
मुझे छूकर जाए कभी ये भी ।।

टहलता रहूं समंदर किनारे
छोड़कर रेत पर पदचिन्ह
मुड़कर देखूं पीछे तो, कहीं
न दिखे फिर वो पदचिन्ह।।

हो हर तरफ शांति अब ऐसी
खुद की धड़कने भी सुन पाऊं
लेकिन कोई आवाज़ दे मुझे
तो उसे मैं कभी न सुन पाऊं।।

बैठा रहूं समुद्र के किनारों पर
निरंतर लहरों को निहारता रहूं
किसी से में अब कुछ न कहूं
दिल की बात उससे कहता रहूं।।

चढ़ जाऊं किसी पहाड़ पर
और ऊंची चट्टान पर बैठा रहूं
वहां से दिखती है जो घाटियां
बस उनको अब निहारता रहूं।।

कह दूं इन पहाड़ों से दिल की बातें
यकीं है मुझे सुनेंगे ये मेरी बात
जानता हूं कुछ कहेंगे नहीं मुझसे
लेकिन समझेंगे ज़रूर ये मेरी बात।।

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