गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

“सीख”

स्वप्न होँ बिखरे अगर, उनको पिरोना कब मना है,
कुछ सुखद यादें हैं गर, उनको सँजोना कब मना है।

हो तिमिर चहुँओर गर, दीपक जलाना कब मना है,
चाहतों को हृदय में, बरबस सजाना कब मना है।

हो अगर आघात, उसको भूल जाना कब मना है,
व्यँग्य-बाणों की चुभन से, पार पाना कब मना है।

मित्र है सच्चा अगर, सच बात कहना कब मना है,
हृदय में है भाव यदि, तो व्यक्त करना कब मना है।

धुन्ध मेँ भी लक्ष्य पर, बस ध्यान रखना कब मना है,
राह हो दुर्गम भले, गिर-गिर सँभलना कब मना है।

शत्रु भी आहत है गर, मृदु-वचन कहना कब मना है,
घाव है गहरा अगर, मरहम लगाना कब मना है।

मन मेँ है यदि भ्रान्ति, उसको दूर करना कब मना है,
उर हो उद्वेलित जो “आशा”, शान्त करना कब मना है..!

रचयिता-
Dr.Asha Kumar Rastogi
M.D.(Medicine),DTCD
Ex.Senior Consultant Physician,district hospital, Moradabad.
Presently working as Consultant Physician and Cardiologist,sri Dwarika hospital,near sbi Muhamdi,dist Lakhimpur kheri U.P. 262804 M 9415559964

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