गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

सिसकता बचपन

इन सड़कों पर सिसकता बचपन देखा मैंने,
फटे कपड़ों से झांकता तन बदन देखा मैंने।

अपनी छोटी सी इच्छाओं को मन में दबाकर,
झूठी मुस्कान बिखेरता मायूस मन देखा मैंने।

जिसे बचपन में खेलना चाहिए खिलोनों से,
उसे कागज़ बीन कर कमाते धन देखा मैंने।

विद्यालय, मदरसे में जा कर पढ़ने की जगह,
दुकानों में गंवाता अपना बालपन देखा मैंने।

साहब! ये किस्मत की नहीं गरीबी की मार है,
करके मजदूरी करता जीवन यापन देखा मैंने।

किताबों के झोले की जगह जिम्मेदारी उठाए,
गरीबी की मार से तड़पता जीवन देखा मैंने।

सुलक्षणा पता नहीं कब बदलेंगे हालात यहाँ,
गरीबी की आग में झुलसता वतन देखा मैंने।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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