.
Skip to content

सिसकता बचपन

डॉ सुलक्षणा अहलावत

डॉ सुलक्षणा अहलावत

गज़ल/गीतिका

August 6, 2016

इन सड़कों पर सिसकता बचपन देखा मैंने,
फटे कपड़ों से झांकता तन बदन देखा मैंने।

अपनी छोटी सी इच्छाओं को मन में दबाकर,
झूठी मुस्कान बिखेरता मायूस मन देखा मैंने।

जिसे बचपन में खेलना चाहिए खिलोनों से,
उसे कागज़ बीन कर कमाते धन देखा मैंने।

विद्यालय, मदरसे में जा कर पढ़ने की जगह,
दुकानों में गंवाता अपना बालपन देखा मैंने।

साहब! ये किस्मत की नहीं गरीबी की मार है,
करके मजदूरी करता जीवन यापन देखा मैंने।

किताबों के झोले की जगह जिम्मेदारी उठाए,
गरीबी की मार से तड़पता जीवन देखा मैंने।

सुलक्षणा पता नहीं कब बदलेंगे हालात यहाँ,
गरीबी की आग में झुलसता वतन देखा मैंने।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

Author
डॉ सुलक्षणा अहलावत
लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की खुशबु आये। शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार में अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हूँ। हरियाणवी लोक गायक श्री रणबीर सिंह बड़वासनी मेरे गुरु हैं। माँ... Read more
Recommended Posts
मोबाइल जिन्दगी
उठते ही मोबाइल देखा। सोते भी मोबाइल देखा।। चलते-फिरते खाते-पीते; बार-बार मोबाइल देखा।। मोबाइल प्रोफ़ाइल देखा। फ़ोटो की स्टाइल देखा।। कौशल अब भगवान से बढ़कर... Read more
पलाश का साधुत्व
ऐ पलाश! मैंने देखा है तुम्हें फूलते हुए, देखा है मैंने- तुम्हारी कोंप-कोंप से प्रस्फुटित होते- यौवन को.. मैंने देखा है, तुम्हें वर्ष भर फाल्गुन... Read more
धरती
धरती मैंने उसको जब भी देखा, खिलते देखा उजड़ते देखा बहकते देखा महकते देखा हंसते देखा रोते देखा स्वर्ण सुरभि छेड़ते देखा पर इसको जब................ Read more
क्या तस्वीरें बोलती हैं
क्या तस्वीरें बोलती हैं हाँ तस्वीरें बोलती हैं मैंने उन्हें बोलते हुए देखा भी है , और सुना भी है उनकी असीम गहराई को बहुत... Read more