कविता · Reading time: 1 minute

सिलसिला मुलाकातों का

कोई अपना सा लगने लगा,
सिलसिला मुलाकातों का चलने लगा।
अपने हमख्याल का साथ पाकर
गम खुशियों में बदलने लगा।।

उनकी मीठी बातों में,
अपनेपन का एहसास जगने लगा।
मुझको पहली बार,
कोई अपना सा लगने लगा।
सिलसिला मुलाकातों का चलने लगा।।।।

उनसे बात किये बिना,
रातें न गुज़री न दिन ढलने लगा।
खो जाने लगे एकदूजे में हरपल,
दिल में अरमान मचलने लगा।
कोई अपना सा लगने लगा,
सिलसिला मुलाकातों का चलने लगा।।।।

मोहब्बत का आगाज़ हो गया,
कोई अच्छा सा लगने लगा।
हरपल हर लम्हा मिलने को,
दिल बेकरार हो तड़पने लगा।
कोई अपना सा लगने लगा,
सिलसिला मुलाकातों का चलने लगा।।।।

हम दोनों की मुलाकातें हुई,
अहसास मीठा सा जगने लगा।
लेकिन समाज के बंधन आड़े आ गए,
और ज़माने का भय डसने लगा।
कोई अपना सा लगने लगा,
लेकिन…….
सिलसिला मुलाकातों का थमने लगा।।।।
(और आज हालात क्या हैं। यही अर्ज़ कर रहा हूँ)

बातें छोटी और रातें लम्बी हो गयी,
उम्मीदें कम मगर चाहत गगनचुंबी हो गई।
मुलाकातें कम इंतज़ार की घड़ियां लम्बी हो गई।
अब तो लगता है जगी थी जो किस्मत,
वो फिर से न जाने कहाँ सो गई।
वो फिर से न जाने कहाँ सो गई।।।।
ढहता का जा रहा आशियाना,
दिल की हसरतों और जज्बातों का।
कम हो गई बातें भी और ठहर सा गया है,
अब सिलसिला मुलाकातों का।।।।
संजय गुप्ता।
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