· Reading time: 1 minute

सिलसिला चलता रहे…

ख़्यालों के काफिले का सफ़र, कभी खत्म तो हो
मंज़िल ना सही, मगर इनका कोई रहगुज़र तो हो…

चश्म-ए-तर से जो, बहे जाते हैं अश्क
समंदर ना सही, मगर कोजा-ए-मुट्ठीभर तो हो…

रूठनें मनाने का सिलसिला, चलता रहे तमाम उम्र
रिश्ता-ए-मुकम्मल ना सही, अग़यार ही मयस्सर तो हो..

कैद-ए-हयात से, आजाद कर दे ए ‘खुदा’
नफ़स को अनफ़ास ना सही, मगर कहीं ठहर तो हो…
– ✍️ देवश्री पारीक ‘अर्पिता’
©®

1 Like · 2 Comments · 122 Views
Like
Author
74 Posts · 12.3k Views
नमस्कार... मैं देवश्री पारीक 'अर्पिता' समर्पित भाव से हिन्दी शिक्षिका (M.A. In Hindi, M.A. In History, B. Ed, 'O' Level From DOEACC Society, Delhi ), कवयित्री हूँ। पूर्व में काव्य-पाठ…
You may also like:
Loading...