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सिमटते पँख

Rajni Chhabra

Rajni Chhabra

कविता

February 4, 2017

पर्वत, सागर, अट्टालिकाएं
अनदेखी कर सब बाधाएं
उन्मुक्त उड़ने की चाह को
आ गया है
खुद बखुद ठहराव

रुकना ही न जो जानते थे कभी
बँधे बँधे से चलते हैं वहीँ पाँव

उम्र का आ गया है ऐसा पड़ाव
सपनों को लगने लगा है विराम
सिमटने लगे हैं पँख
नहीं लुभाते अब नए आयाम

बँधी बँधी रफ़्तार से
बेमज़ा है ज़िंदगी का सफर
अनकहे शब्दों को
क्यों न
आस की कहानी दें दे
रुके रुके क़दमों को
फिर कोई रवानी दें दे/

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Author
Rajni Chhabra
कवियत्री व् अंकशास्त्री /हिंदी, इंग्लिश , पंजाबी में कविता लेखन व उर्दू, राजस्थानीं, पंजाबी से हिंदी , इंग्लिश में अनुवाद कार्य, रचनाएं व इंटरव्यू दैनिक भास्कर, राजस्थान डायरी,अमर उजाला, अनुवाद परिषद्, देहली, इंडियन लिटरेचर, साहित्य अकेडमी द्वारा प्रकाशित /होने से... Read more

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