सिमटती दुनिया बिखरता परिवार

सिमटती दुनिया बिखरता परिवार
वातावरण मे नेट (इंटरनेट) का जाल और मस्तिष्क मे माया जाल ,दिग्भ्रमित होती युवा पीढी ,और विलुप्त होती भारतीय संस्क्रिति’..
सर्व जन हिताय सर्व जन सुखाय ‘से सुसज्जित भारतीय संसक्रिति कब ‘स्व सुखाय स्व हिताय ‘मे परिवर्तित हो गई पता ही नही चला

..’वासुधैव कुटुम्बकम ‘ तो जैसे एक स्वप्न मात्र!!
अतिथी देवो भव की परिपाटी वाले इस देश मे कब अपने ही परिवार के लोग अतिथी लगने लगे पता ही नही चला .
.वक्त की मॉग और बदलते परिवेश ने युवा पीढी के रहन सहन खान पान को पूरी तरह से प्रभावित किया ..
सिमटती युवा पीढी ने अपने आपको अपनी ही म्रगमरीचिका मे लिप्त रखा है वह किस ‘सपने की होड मे अपनो को छोड ‘ रहा है शायद वो भी इस बात से सम्पूर्णता अन्जान है

.इस बदलाव पर गौर करे और गम्भीरता से सोचे तो यह बदलाव स्वत: ही और अचानक नही आया ..
कही न कही कुछ हद तक महत्वकॉछी मॉबाप भी इस परिस्थिति के जिम्मेदार है .
बचपन से ही बच्चो को अपनी असफलताओ की दुहाई देकर उनके अच्छे भविष्य के लिए उन पर दबाव बना कर रखते है ,,
कभी पढाई की बंदिश ,कभी सामाजिक .
.तो कभी आर्थिक बंदिश ..
१२ पास करते करते माता पिता इस उधेडबुन मे व्यस्त हो जाते है कि उच्च शिछा के लिए बच्चे को कहॉ भेजा जाए …
और बच्चा भी कही न कही मॉबाप के स्वप्न के पंख लगाकर दबिश और बंदिश की गुलामी से स्वतंत्रता चाहता है …
बस!यही से शुरु होता है अलगाववाद, ,,विषमताए ,परेशानियॉ …
बच्चो के उज्जवल भविष्य के सपने बुनते हुए मॉबाप अक्सर शायद भूल जाते है कि एक कठिन भविष्य एकाकीपन का दु: स्वप्न लिए उनका इन्तजार कर रहा है .
.खैर इस बात से अन्जान अपनी ममता मे रचे बसे मॉबाप बच्चो की हर जायज ,नाजायज फरमाइशे पूरी करते करते कब अपने लिए मित्व्ययी होते चले जाते है पता ही नही चलता ..और बच्चे सिमट ते जाते है अपनी ही दुनिया मे ..
जहॉ इंटरनेट से सुसज्जित मोबाइल लैपटॉप है ..उनकी खुद की प्राइवेसी और उनका एक सीमित दायरा …
क्या ये net world slow poision की तरह युवा पीढी को प्रभावित नही कर रहा?
या यू कहे की दीमक की तरह हमारी मानवीय मूल्यो एवं संस्कारो को चाट रहा है..
रही सही कसर fast food ने पूरी कर दी …. इस अंधी दौड मे बच्चे कभी जरूरत के लिए और कभी शौक के लिए मॉ बाप की भावनाओ से भी खेल जाते है..
खैर लम्बे इंतजार के बाद उच्च शिछित बच्चे का प्लेसमेन्ट होता है और मॉबाप चैन की सॉस लेते है .
.पर ये क्या बच्चे के पास तो सॉस लेने की भी फुर्सत नही है ..वो तो digital India का digital बेटा बन कर आया है
..अपनी ही दुनिया मे इतनाfit है कि मॉबाप को भी unfit पाता है
.तरक्की के नाम पर बडे शहर मे तबादले पर प्रफुल्लित बच्चा अपने ही मॉबाप को छोड कर अपनी मंजिल की ओर रुख कर लेता बिना ये सोचे की इसी दिन के लिए मॉ बाप कब से आस लगा कर बैठे थे .
युवा वर्ग शायद भावनात्मक स्तर पर सोचना ही नही चाहता ..
वर्तमान मशीनी युग मे कही न कही वो भी सिरफ मशीन बन कर रह गया .
.स्नेहिलऑखो से विदा करते वक्त रुधे गले और सजल नयन से मॉ शायद तारतम्य नही बैठा पाती …और कह नही पाती कि रूक जाओ!!!! ..
मॉ बाप की दुनिया सिमट गई एक कमरे मे जहॉ रह गई सिरफ यादे ,
उसके लिए बुने गए सपने,
उसके लिए सोची गई उज्जवल भविष्य की कामना..
.संवेदन हीन युवा पीढी के सपने की पूर्ति मे मॉ बाप कब निरीह से बेबस और बेबस से लाचार बन जाते है शायद वो इस बात से बिल्कुल अनभिग्य से है ..
क्यो की युवा पीढी के पास भावनात्मक आत्मीयता ही नही है
“use n throw’ की तर्ज पर चल रहे सामाजिक परिवेश मे …..’आज मिले कल बिछडे’..की रौ सबसे ज्यादा आत्मीय और खून के रिश्ते को प्रभावित करती नजर आती है

.इससे ज्यादा कल्पना भी क्या की जा सकती है आज के मशीनी युग मे ..
जहॉ भौतिक संसाधनो के जुगाड मे युवा पीढी अन्जाने ही अपने प्रगाढ रिश्तो को खो रही है

.. कितनी सिमट गई है युवा पीढी जहॉ मानवीय मूल्यो संस्कारो एवं भावनाओ का कोई मोल नही ..
जहॉ मोल है सिर्फ अपनी व्यक्तिगत भावनाओ का !!!
आज तक समझ नही आया कि बदलते परिवेश मे बदल गई दुनिया या बिखर गई दुनिया ??..
किसी भी देश की तरक्की निर्वाभर होती है युवा वर्ग की स्रजनशीलता एवं कार्य शीलता पर ,उसकी सोच पर ,उसके दायित्व निर्वाह पर ,
पर अफसोस जो अपने पारिवारिक दायित्वो को भली भॉति नही निभा सकता वो क्या सम्भालेगा देश को ..समाज को ..??
और वो ममत्व वो स्नेह वोसमर्पण वो प्यार सब कुछ एक पल मे अन्जाना सा हो गया,..

. युवा पीढी की दुनिया सिमट गई उनके net world और higher education मे ..और मॉबाप सिमट गए एकाकीपन मे

बेचारे बुजुर्ग दम्पति क्या जाने ये नेट world ..उनकी net working जो आपसे शुरू होकर आप पे ही खत्म .. ..सचमुच कितनी सिमट गई दुनिया और कितने बिखर गए परिवार …

नीरा रानी…..

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