कविता · Reading time: 1 minute

सिपाही

सुनो सिपाही
कुछ सुनाओ न
अच्छा सा
झरबेरियों पर उगी
खट्टी मीठी बेरियों पर
बच्चों के पत्थर और
बया के घोसलों के बारे में
या उस जंगल के बारे में
जिसमे रहने वाले
गुज़ारा कर रहे थे
खुद का
पेड़ों पत्तियों पर निर्भर हो
और तुमने उजाड़ दिए उनके घर
मार कर लाशों को थमा दी बन्दूकें
बना कर नक्सली
उनकी हत्या तक का क्रेडिट ले डाला
क्योंकि तुम्हारे हाथ बंधे थे
पर क्या दिल भी बन्ध गया था तुम्हारा
खैर छोड़ो
कुछ कश्मीर पर कहो
सुना है जन्नत है
खूबसूरत,
जहां सेब से भी लाल
और सस्ता खून
वहां के लोगों का है
जिन्हें तुम बहा आते हो जब तब
सड़कों पर, खेतों की मुंडेरों पर,
कभी उनके अपनों के सामने ही,
की मरने वाले को जुर्म तक कि भी
खबर नहीं होती उसके,
और अपने??
उन्होंने तो सिख लिया है,
इस बर्बरता को जीना
और तुम?
बंधे हाथों चला आते हो गोलियां
क्या सो पाते हो चैन से?
अपने ज़मीर को तसल्ली दे
खैर छोड़ो
कोई गीत सुनाओ
प्रेम गीत,
क्योंकि वही तो कर लेते हो तुम
शब्दों से छेड़छाड़
क्या तुम जीवित हो
भावनाओं के साथ
सच बताना सिपाही
सुना है लोग मर जाते है
बेज़मीर होकर

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